Tuesday, March 13, 2012

पहाड़ बहुत उदास रहने लगा है



उभरते कवि - 2


लाहुल स्पिति के कुछ युवा हिन्दी कविता मे गहरी दिल्चस्पी ले रहे हैं ... सुनीता कटोच DIET तन्दी मे कार्यरत हैं और जाहलमा गाँव से सम्बन्ध रखती है. एकाध वर्षों से बहुत अच्छी कविता लिख रही हैं . उत्तरोत्तर ग्रो कर रही हैं. यह इन का अब तक का बेस्ट है . इसे पोस्ट करते हुए खुशी हो रही है . शुभ कामनाओं के साथ .

आज गाँव ने मेरे नाम चिट्ठी भेजी है

अपने बचपन से लेकर बुढ़ापे तक की बात लिखी है

खेतों से लेकर पहाड तक की बात लिखी है

चिट्ठी पढते पढते मैं भी मनो गाँव पहुँच गई

जो गलियाँ शाम होते ही बच्चे हो जाते थे

अब वो शाम होते ही बूढ़े हो जाते हैं

जिन गलियों ने हमारा बचपन लिखा

आज वो खामोश है

अब ना तो बच्चे इन गलियों में खेलते हैं

ना ही घरों की औरतें वहां एकत्रित होते है

सब अपने अपने घर तक सीमित रह गए हैं

गाँव के आँगन में फूल तो बहुत खिलते हैं

पर उन की खुशबुओं का आनंद कोई नहीं लेता

उन फूलों की खुशबुओं को

चारदीवारी लगा कर कैद कर लिया गया है

खेतों में अब नहीं दीखते बैलों के जोड़े

सब मशीनी हो गया है

पर औरतें अब भी भोर होते ही

खेतों से मिलने जाते है

नदी अब भी उतने ही जोश से बहती है

पर मन ही मन डरी रहती है

कि ना जाने कब उसकी स्वछंदता खत्म हो जाए

सामने का पहाड़ बहुत उदास रहने लगा है

सुना है उसे छेड़ने की तैयारी पूरी हो चुकी है

अगर यह पहाड़ और नदी टूट गए

तो मेरी मृत्यु भी निश्चित है

इनके होने से मैं अब तक जिंदा हूँ

फिर तो मेरे यह खामोश गालियाँ

और लहलहाते खेत भी मर जायेंगे

और उसके साथ मर जायेंगी

तुम्हारी सारी यादें

क्या सिर्फ उन यादों को जिंदा रखने के लिए

तुम वापिस नहीं आ सकते ?

मैं स्तब्ध थी

खामोशी ने मुझे घेर लिया

जिसे शहर के शोर ने तोड़ लिया

मीटींग ,वर्कशॉप ,और बच्चों का भविष्य

इन सब के बीच दब सी गई

चिट्ठी से उठती हुई आवाजों का शोर

2 comments:

सुनीता said...

Dhanywad Ajay Kaka maine to abhi dekhaa ...logon ko meri kavitaayen padhvaane ka shukriya

roshan thakur said...

very nicely written