Wednesday, July 25, 2012

मंज़ूर शुदा सरकारी अहाते में एक भाई बहुत “हाई” था


जुलाई 19, 2012

यह  आधुनिक पटनी भाषा है जिस पर हिन्दी और पंजाबी का बेहद असर है. वाचक भाई एक पब/ रेस्त्राँ में दारू के नशे मे *हाई* है . कुछ दर्ज करने योग्य बातें मैंने लिखी हैं . कि कभी काम आएंगीं. इन डायलॉग्ज़ मे तकिया कलामों और रसीली बोलियों के अलावा रोचक स्वीकारोक्तियाँ थीं , अद्भुत दावे थे ,और महीन मनोवृत्तियाँ थीं. मुझे बीयर के साथ इस का ऐसा स्वाद लगा कि मन ही मन इन बातों को एक कविता मे अरेंज करने लगा . अति हो गई तो एक पेपर नेप्किन पर इसे दर्ज कर डाला .


बड़ा बनने की बात नहीं है
सब से बड़ी चीज़ है इज़्ज़त , मश्ता ?
गलत साङ गलत होता है
है तो है भई
उस में क्या डरना ?
कोई क़तल थोड़ी किया
अपणा अपणा देखणा पड़ता है मश्ता ?
कल दिन क्या पता ?
दे भाई यह रिजक है
कुछ किया है मैंने तो
माँ कसम !
उस में झूठ क्या बोलणा
इतना तो मैं बोला था
साफ गप्पा
सब कुछ मंत्री को देणा है तो मैं ने क्या खाणा ?
क्यों ?
धन्दा है !!
उसका भी मेरा भी
बच्चे पालने हैं
लाड़ी को खुश रखणा है
मश्ता ? उस मे क्या छुपाणा ?
पता है सब को
सब करते हैं
मैं कोई केल्ला थोड़ी हूँ ?
इसी लिए अपणा एक ही रक्खा है
मोटा हिसाब
और मैं नईं डरता लाड़ी - लूड़ी से
न उस के बाप - बूप से
बाप कसम !
अब्भी फोन कर सकता हूँ गलफ्रेंड को
लाड़ी के सामणे भी
माँ चो...... भाई ने देखा है
हप्सिआ भाई ?
लाड़ी भी सोचती होगी
तू है क्या
और क्या तेरा शक्कल है
फिर भी
भई रखते होते हैं !

अपणा शुरू से ही ऐसा है
छोटे  भाई 
अब तो बुड्ढा हो गया माँ चो ........
बेटा भी जिण्ड हो गया है
मेरा जूता नईं आता उस को
उस को कंपणी में फिट करना है यार
ला भई खोल फिर एक बीयर
भाई के लिए
पोलर बीयर नई
मोज़र बीयर .......
भेंचो ......
क्या बोलणा
गलत साङ गलत होता है !
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मश्ता = नहीं ? ( =क्या ऐसा नहीं है ?) 
साङ = असर्टिव अभिव्यक्ति 
दे = यह ( संकेत करते हुए )
रिजक = धन्धा , रोटी कमाने का साधन 
गप्पा = बात 
लाड़ी = बीबी 
केल्ला = अकेला 
हप्सिआ= क्या यह झूठ है ? 
शक्कल = शक़्ल 
जिंड = हट्टा कट्टा जवान 
मोज़र बीयर = मोज़र बेयर , लाहुल मे जल विद्युत परियोजनाऑं की शुरुआत करने वाली एक प्रमुख कंपनी 

Tuesday, July 10, 2012

कैसे मिला लाहुल-स्पिति को जनजातीय दर्जा,
इतिहास के कुछ पन्‍ने मेरी डायरी से

---(राहुल देव लरजे) 


            भारत का संविधान लागू होने के पश्‍चात सन 1952 में आजाद भारत में प्रथम चुनाव किए गए।लाहौल को पंजाब राज्‍य के कुल्‍लू संविधान क्षेत्र में रखा गया और 26 जनवरी का दिन वोट देने का दिन निश्चित किया गया।समस्‍त लाहौल वासियों के लिए कुल्‍लू क्षेत्र के वशिष्‍ठ एवं स्पिति वासियों के लिए कलाथ को पौलिंग स्‍टेशन बनाया गया।जैसा कि लाहौल जनवरी माह में बर्फबारी के कारण स्‍वाभाविक तौर पर बन्‍द रहता था,अत्‍ाःचुनाव की तिथि जनवरी माह में होने की वजह से लाहौल-स्पिति के लोगों में बेहद निराशा थी।उस समय कुल्‍लू पहुंचने के दोनों रास्‍ते जो कि रोहतांग और कुजंम दर्रा थे,दोनों शीतकाल में बर्फबारी की वजह से बन्‍द थे।

Lahoulians casting their votes
                                    ठीक इसी वर्ष जाहलमा गांव के लाहौर में शिक्षित युवा श्री शिव चंद ठाकुर और वरगुल के श्री देवी सिंह ठाकुर ने गलत समय में चुनाव कराए जाने की वजह से समस्‍त लाहौल वासियों को इन राष्‍ट्रीय चुनावों का बहिष्‍कार करने का आग्रह किया।इन चुनावों के विरोध में कई जगह जूलूस भी निकाले गए।अन्‍ततःभारत सरकार ने जायज मांग को स्‍वीकार करते हुए पुनः23 मार्च 1952 को लाहौल-स्पिति वासियों के लिए चुनाव का दिन चुनने का निर्णय लिया।किन्‍तु यहां की जनता ने इस तिथि का भी घोर विरोध किया।ततपश्‍चात पंजाब राज्‍य सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार ने स्थि‍ति का जायजा लेने का निर्णय लिया।

            अतःलाहौल के जनता के कुछ प्रतिनिधियों के दल को दिल्‍ली से बुलावा आया।ठाकुर देवी सिंह एवं शिव चंद ठाकुर तुरन्‍त दिल्‍ली रवाना हुए और वहां तत्‍कालीन प्रधानमन्‍त्री पंण्डित जवाहर लाल नेहरू,रक्षा मन्‍त्री सरदार वल्‍लभ भाई पटेल एवं कानून मन्‍त्री बी.आर.अम्‍बेदकर से मिले और उन्‍हें लाहौल-स्पिति की समस्‍या से अवगत कराया।उचित समय देखते हुए इन्‍होनें लाहौल-स्पि‍ति को संवेधानिक तौर पे जनजातीय दर्जा देने की मांग रख दी।

       प्रधानमन्‍त्री नेहरू ने स्‍िथ्‍ाति का वास्‍तविक जायजा लेने के लिए अपने निजी नुमायदे श्रीकान्‍त को लाहौल्‍ा भेजने का निर्णय लिया।जब श्री कान्‍त लाहौल पहुंचे तो वहां के पिछडेपन से रूबरू हुए।उन्‍होने देखा कि समस्‍त इलाके में सडक,बिजली और अस्‍पताल भी मुहया नहीं हुए थे।उन के अनुसार उस समय समस्‍त लाहौल घाटी में मात्र 4 स्‍कूल उपलब्‍ध थे।लाहौल की जनता ने उपयुक्‍त समय देखते हुए उन से एक अलग जनजातीय परिषद की मांग भी उन के समक्ष रख दी।

Blue shaded area is L & S
             अपनी लाहौल यात्रा के पश्‍चात श्रीकान्‍त ने अपनी रिपोर्ट दिल्‍ली में भारत सरकार को सौंप दी।अन्‍ततःसन 1956 में अनुसूचित जनजातीय अधिनियम संशोधन के द्वारा भारत सरकार ने लाहौल-स्पिति को जनजातीय जिला घोषित कर दिया।इस के 4 वर्ष के पश्‍चात सन 1960 में इसे पंजाब राज्‍य के एक पृथक जिले का दर्जा दिया गया।इस से पूर्व य‍ह कुल्‍लू जिले का एक तहसील मात्र था।

      सन 1966 के पंजाब पुर्नगठन अधिनियम के द्वारा पुनःलाहौल-स्पिति को जनजातीय क्षेत्र का दर्जा दोहराया गया और यह हिमाचल राज्‍य का एक सम्‍पूर्ण हिस्‍सा बना।इस के पश्‍चात सन 1971 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्‍य का दर्जा मिलने से सन 1975 में चम्‍बा लाहौल का क्षेत्र जिस में उदयपुर से तिंदी तक का इलाका आता था,को भी लाहौल में जोड दिया गया।ततपश्‍चात लाहौल जिला को भारतीय संविधान के समय-समय के जनजातीय आदेशों के तहत एवं अनुसूची 342(1) के अनुसार जनजातीय क्षेत्र का दर्जा दिया जाता रहा है।

Sunday, July 8, 2012

मैं वहाँ अपनी कविता मे जान डालने के लिए जाता हूँ


कुल्लू के भारत भारती स्कूल मे हर वर्ष स्व. दया सागर स्मृति नवलेखन कार्य शाला  का आयोजन होता है. जिस मे प्रतिभागी छात्र स्वरचित कविताओं का पाठ करते हैं तथा वरिष्ठ लेखकों के साथ इन पर चर्चा करते हैं . इस क्षेत्र मे  सार्थक लेखन का माहौल बनाने मे इस वर्क शॉप की महत्वपूर्ण भूमिका है . मैं 2008 से इस आयोजन मे भाग लेता रहा हूँ . इस कार्यशाला मे मुझे नई पीढ़ी की बौद्धिक प्यास और कला अभिरुचियों का पता चलता है . और निस्सन्देह मुझे मौलिक दृष्टि मिली है . आश्चर्यजनक प्रेरणाएं, अद्भुत विचार  मिले  हैं. इस  डायरी अंश मे कुछ यादें क़ैद हो पाईं हैं .

डायरी अंश



जुलाई 3, 2012 . प्रातः 6:00 बजे


तीन दिनो से केलंग बेहद गर्म हो रखा है. भागा गरज रही है . बहुत मिट्टी आ रही है . लगभग काली हो चली है.  खिड़की से झाँकता हूँ , नदी के तमाम छोटे छोटे पत्थर पानी मे छिप गए हैं. बस वह आखिरी बड़ी चट्टान दिख रही है. यह चट्टान मेरा थर्मामीटर है. इस पर पानी  का स्तर देख कर मैं केलंग के तापमान का अन्दाज़ा लगाता हूँ.

आज सर दर्द कुछ कम है. ब्लड प्रेशर कभी बहुत ‘हाई’ हो जाता है तो कभी एकदम ‘लो’. आज सर दर्द कुछ कम है. ब्लड प्रेशर कभी बहुत ‘हाई’ हो जाता है तो कभी एकदम ‘लो’. आज न्यूरो सर्जन से मिलूँगा . डॉ योस्पा मेरे बचपन के दोस्त किशन के बड़े भाई हैं. ये लोग शिमला देहरादून से  किसी घरेलू फंक्शन के सिलसिले मे घर आए हैं . मैं यह मौका नही चूकना चाहता . अरसे बाद किशन से भी मिलना होगा .

कविताओं की ‘हार्ड कॉपी’ ज्ञानरंजन को भेजनी है . ज्ञान जी मेरी सम्पूर्ण कविताएं एक साथ पढ़ना चाहते हैं. सम्भव हुआ तो मेरी कविताई पर कुछ लिखेंगे भी. आज वर्कशॉप से गाड़ी मिल जाएगी. एक लाख का एस्टिमेट है.. लेकिन अभी इंश्योरेंस के कागज़ात पूरे नहीं हैं. शायद आज पतलीकुहुल पहुँचना भी सम्भव नहीं. रजिस्ट्री के लिए पता नही कौन सी  तारीख मिलेगी ?  पता नहीं डॉ साहब क्या क्या निर्देश देंगे ? सी टी स्केन , एक्स रे , अन्य जाँच और दवाएं ....... पहले सरकारी काम निपटा लूँ , फिर छुट्टी निकलूँगा. 12 तक लौटना है. इतने कम समय में क्या कुछ कर पाऊँगा ?

“भाषा” का नया असाईनमेंट पूरा करना है.  डॉ देवी और तोब्दन जी को  नाराज़ नही कर सकता .  निरंजन  के नवलेखन कार्यशाला पर कुछ लिखना है. बार बार फोन आ रहे हैं.  क्या लिखूँ ?

सर्वप्रथम तो यह कि नवलेखन व्यापक विषय है. तो हर बार  कार्यशाला किसी एक विधा पर फोकस्स्ड हो . विभिन्न विधाओं पर एक साथ चर्चा करना सम्भव नहीं. वैसे यह एक सार्थक आयोजन है .पर इस की समय सीमा बढ़ाई जाए . प्रस्तुत कविताओं  के कला और विचार पक्ष पर संतुलित चर्चाएं हों . इधर की कविता पर विचार बहुत हावी है. इस लिए चर्चाएं भी विचार केन्द्रित ही होतीं हैं. निरंजन की कार्यशाला भी इस दबाव से मुक्त नहीं. फिर भी यहाँ काफी सम्भावनाएं बनतीं हैं. और मैंने हमेशा  कला पक्ष पर ही सायास कुछ कहा है, चाहे अंट - शंट ही !

मैं 2008 से इस वर्क शॉप का नियमित प्रतिभागी हूँ . आरम्भ से ही मुझे कुछ अद्भुत छात्र कवियों को सुनने का मौका मिला. कुछ  नाम याद रह गए हैं ..... तीस्ता , कमलजीत, कृष्णा, नरेन्द्र, पूर्वा,  विपाशा, ज़ोया ...........  बहुत से नाम भूल भी गया हूँ .... जो जो याद आते हैं उन्ही के सन्दर्भ से  कुछ कहता चलूँगा .

         एक वर्कशॉप मे तीस्ता  ने शीर्षक का मसला उठाया था . कि उस की क्या उपयोगिता है, और वह क्यों ज़रूरी है ? वहाँ कोई संतोष जनक उत्तर सामने नहीं आया था . मैं खुद  कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाया . आज भी मुझे इस बात का मलाल है. मेरे लिए कविता का शीर्षक रखना ठीक उस तरह का मामला नही है जैसा कि अपने बच्चे का या प्यारे ‘पपी’ का नाम रख देना; या किसी बर्तन पर हेंडल फिक्स कर देना या किसी  युवराज को मुकुट पहना देना . कभी कभी  शीर्षक कविता के कंटेंट का खुलासा करता है. उस की व्यंजना को दिशा देता है. उस के सन्दर्भ खोलता है. उस की ग्राह्यता मे सहायक होता है, क्लूज़ ( सूत्र) प्रस्तुत करता है. लेकिन हर तरह की कविता का शीर्षक ऐसा ही हो ज़रूरी नहीं. बल्कि किसी किसी विधा में तो  शीर्षक भी ज़रूरी नहीं .  मसलन गज़ल. भजन. रुबाई. चौपाई, दोहे . शे’र ...... शीर्षक की असल अहमियत आधुनिक विचार कविता मे है. उस के शिल्प की  वजह से. फिर कथ्य  ही शिल्प को  तय करता है. माने, बहुत कुछ कविता के कंटेंट पर निर्भर है .  शीर्षक का मसला बहुत महत्वपूर्ण  है, और पेचीदा भी. कभी इस विषय पर एक छोटा फेसबुक नोट या ब्लॉग पॉस्ट लिखूँगा.  तो इस कवि के पास कुछ गम्भीर  और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं , बहुत गहरे दबे हुए, जिन्हे शेयर करने के लिए वह बेचैन है. बाद के वर्कशॉप्स मे  तीस्ता नही दिखी . उम्मीद है कि वह कविता मे ही खुद को अभिव्यक्त कर रही होगी. या हो सकता है कोई इतर माध्यम खोज लिया हो ! 

        कमलजीत की पहली कविता याद आती है.  इस मे कुल्लू दशहरा मेले से रोचक, सार्थक व ज़िन्दा  चित्र उठाए गए हैं. कवि की नज़र मेले के उन्माद और उस की भव्यता मे  न खो कर ऐसे ‘लेस नोटिस्ड  स्पॉट्स’  की  पड़्ताल मे व्यस्त है जहाँ जीवन के  असल रूप धड़कते हैं. कमलजीत बाद के आयोजनों मे भी नियमित शिरकत करता रहा. इस वर्ष उस ने आध्यात्म पर कुछ कविताएं पढ़ीं. यह चौंकाने वाला था. वैसे मै नहीं समझता कि  किसी कवि के “बनने” में  हमें अनावश्यक दखलअन्दाज़ी करनी चाहिए. उस की  नैसर्गिक ग्रोथ ही स्वयम कवि  और  कविता के हित में  है. बाद मे ज्ञान प्रकाश विवेक से मैंने इस पर चर्चा की. उन्हे कमलजीत की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं और और प्यास काफी हद तक मौलिक और प्रामाणिक लगीं. उन्हो ने चिंता भी ज़ाहिर की कि इस उम्र मे इस तरह का जुनून बच्चों के लिए अहितकर भी हो सकता है. मेरा  मतलब यह क़तई नहीं है कि हम  धार्मिक/ रूढ़िवादी कविता को प्रोमोट करें. मैं किसी कवि के भीतर  कविता की  ग्रोथ के तमाम तलों को स्वीकार करने की बात कर रहा हूँ. . कबीर ने भी  पहले ही इंस्टेंस पर  कठमुल्लाओं के खिलाफ दोहे नहीं लिख दिए होंगे. धर्म को ‘समझ’ लेने के बाद ही उस की निरर्थकता को उजागर किया होगा .  कमलजीत ने कार्यशाला मे प्रश्न रखा कि उस की कविता मे उर्दू और पंजाबी के शब्द स्वतः आ जाते हैं, अनजाने ही... और इस बात से अभिभावक परेशान रहते हैं कि कि वह मुसलमानों की भाषा  इस्तेमाल  करता है. कुल्लू जैसी जगह के लिए  अप्रत्याशित किंतु महत्वपूर्ण मसला . रूढ़िग्रस्त समाज की  संकीर्ण सोच का दबाव्. कोई  भाषा किसी धर्म विशेष की बपौती नहीं. यदि किन्ही कारणों से अधिकाँश लोग उर्दू को भारत में इस्लाम की भाषा मानते भी हों तो किसी धर्म से ऐसा विद्वेष भी नाजायज़ है. बड़ी कठिनाई से मैं  परस्पर   उलझी हुई ये दो बातें वहाँ रख पाया.  मुझे लगा कि यह बात मैं कमलजीत के इलावा वहाँ मौजूद अन्य लोगो को भी समझाने का प्रयास कर  रहा था. यह शायद हिन्दी समाज की पारम्परिक विडम्बना रही  है जिस पर ध्यान देना इधर हम छोड़ चुके हैं. इस विषय पर एक विस्तृत आलेख लिखने का मन हुआ है. कमलजीत  उर्दू- पंजाबी ही नहीं , लोकभाषा का भी सुन्दर प्रयोग करता है. यह हिन्दी के सरवाईवल के लिए यह ज़रूरी है. कविता को ठस्स गद्य होने से बचाने लिए और भी ज़रूरी.

       कृष्णा एक टेलेंटेड किंतु शारीरिक रूप से अक्षम युवती. वह केवल पाँचवीं कक्षा तक ही पढ़ पाई है. चित्र कला और लेखन मे बहुत रुचि है. उस के पास बहुत गहरे व्यक्तिगत अनुभव हैं लेकिन उपयुक्त विधा की तलाश बाक़ी है. इस वर्कशॉप मे ऐसे बहुत से बच्चे / युवा शामिल होते हैं जिन का कविता  की अधुनातन प्रवृत्तियों से पूर्व परिचय नहीं होता. न ही ये लोग पारम्परिक शैलियों और विधाओं से अवगत होते हैं. लेकिन यहाँ  बहुत अच्छी रिवायत  है कि  कुछ पत्रिकाओं के ताज़ा और क्लेसिक अंक , कुछ नई पुरानी चर्चित किताबों  की प्रतियाँ डिस्प्ले पर रखी रहतीं हैं. . विक्रय के लिए भी. ऐसे छात्रों को पुस्तकें उपहार स्वरूप भी दी जाती हैं. मैंने  कृष्णा को कुछ जर्नल्ज़ दिये थे, कृतिओर, उन्नयन आदि .  मालूम नही क्या असर रहा ?  इस वर्कशॉप की एक दिक्कत यह है कि आम तौर पर प्रतिभागी रिपीट नही होते. एक फोलोअप योजना बनाने की ज़रूरत है, कि इस श्रमसाध्य उपक्रम के प्रभावों का आकलन हो.

          ज़्यादातर छात्र प्रतिभागी गहन मानवीय मुद्दों पर कविता कहना चाहते हैं . इन मुद्दों को ले कर  उन मे अतिरिक्त उत्कटता है. लेकिन व्यापक अनुभव की कमी के कारण बहुत अस्पष्ट लिखते हैं . एक प्रबुद्ध श्रोता ने अचम्भित होते हुए चुटकी ली थी — पता नहीं इतने बड़े मुद्दे वास्तव मे इन के अपने भी हैं या नहीं ! जो भी हो  इतने बड़े इश्यूज़ पर बात करने की उन की आकाँक्षा मात्र  प्रशंसनीय है. और लाख वैचारिक असहमति के बावजूद इन ज़टिल मुद्दों पर  उन के बालसुलभ दृश्टिकोण को समझना अति रोचक विषय है. इस वर्कशॉप मे बहुधा एक प्रश्न मेरे सामने खड़ा होता रहा है -  क्या हम वैचारिक परिपक्वता के नाम पर किसी कवि की मौलिकता के साथ छेड़ खानी कर सकते हैं ? मेरे लिए तो ये कविताएं ‘आई ओपनर’ होती हैं . इसी प्रेरणा से मेरी कविता ‘मुझे इस गाँव को उन बच्चों की नज़र से देखना है’ लिखी गई थी .

अकसर कुछ अम्बेरेसिंग स्थितियाँ भी पैदा हुईं  हैं जब कुछ बच्चों ने  अनजाने मे ( कि यह रेसिटेशन का वर्कशॉप है)  , और कुछ ने जान बूझ कर ( कि किसी को पता नहीं चलेगा ) किसी स्थापित कवि की कविता पढ़ ली. इस से बचने के लिए कार्यशाला का उद्देश्य, एजेंडा  और कार्य योजना के बारे स्पष्ट तथा विस्तृत  पूर्व प्रचार हो. ज़्यादातर बच्चे शौकिया लिखते हैं . मैं चाहता हूँ कि शौकिया लेखन , चाहे उस का कोई खास बड़ा महत्व नहीं होता , को भी उचित सम्मान मिले. शौकिया लेखक ही  गम्भीर पाठक / आलोचक होते हैं.             

कविता पाठ के सिलसिले मे ज़ोया नाम का नन्हा चेहरा  याद आता है. और भारत भारती स्कूल की  हेड गर्ल दिव्या की आत्मविश्वास पूर्ण शायरी . वह ग़ालिब की ‘फेन’ थी और  गालिब के अन्दाज़ मे ही शायरी करती थी. प्रेरणा भी महान रचना को जन्म दे सकती है बशर्ते कि उस का उपयोग प्रामाणिक अनुभूतियों से जोड़ कर किया जाय. जहाँ वह निपट ‘नकल’ न लगे .  पाठ के मामले मे मैं स्वयम अप्रेंटिस हूँ. यहाँ बच्चे सहज, बिना काँशस हुए, निर्बाध प्रवाह से काव्य पाठ करते हैं. मैं इन स्व्च्छ निर्दोष आत्माओं से बहुत सीखता हूँ. सच पूछो तो मुझे अपने पाठ के लिए आत्मबल यहीं से मिलता है. मैं बहुत अच्छा पाठ करना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि ये बच्चे भी कथ्य के अनुरूप प्रभावशाली पाठ सीखें. इस के लिए कुछ सशक्त कविताओं का पाठ कुछ ऊर्जावान कवियों से कराया जाय तो कार्यशाला को बहुत लाभ होगा. माने, एक एग्ज़म्पलरी क़िस्म का काम . ईशिता आर गिरीश से यह काम बखूबी करवाया जा सकता है . बाहर से भी कवि बुलाए जा सकते हैं..

नरेन्द्र और विपाशा की काव्य भाषा परिष्कृत है. और कविताएं परिपक्व. विपाशा मे किशोर मन की ईमानदार वाँच्छाएं और स्वपनिल उड़ाने हैं. जब कि नरेन्द्र मे आज के ग्राम्य जीवन के ठोस यथार्थ को  देखने समझने की तड़प है. नरेन्द्र की कविता मे एक छोटी सी  शिल्पगत झोल मैने नोटिस की थी पता नही वह उसे ठीक से सम्प्रेषित हुआ या नहीं. हाल ही मे कहर सिंह के नाटक उत्सव में मैंने उसे शानदार अभिनय करते देखा . कलाविधाओं मे आवागमन ज़रूरी है. खास तौर पर पेंटिंग और थियेटर से तो कविता का गहरा संबंध है. उम्मीद है कि थियेटर से जुड़ाव उस  की कविता को वाँछित धार देगा. या कौन जाने,  थियेटर मे ही वह अपनी क्रिएटिव ऊँचाईयाँ छू जाए ! नरेन्द्र  और इस वर्कशॉप के तमाम प्रतिभागियों, आयोजकों  को शुभकामनाएं . द शो मस्ट गो ऑन!

.......अरे बाप रे !! साढ़े आठ बज गए . पानी ढोना है, रात के बरतन माँजने हैं . नाश्ता तय्यार करना है और नहा कर  दफ्तर भी पहुँचना है.   अंत मे इस वर्ष की कार्य शाला की  तीन महत्वपूर्ण बातों का ज़िक्र ज़रूरी है

एक, छात्र लेखकों के वक्तव्य और प्रश्नावली पर उन के उत्तर. दो, वरिष्ठ गज़ल गो , कथाकार ज्ञानप्रकाश विवेक की उपस्थिति और रचनाओ पर उन की विस्तृत टिप्पणियां . तीन, मेरे प्रिय अग्रज कवि मित्र अग्निशेखर की उपस्थिति . इस आशा के साथ कि अग्नि भाई की असीम ऊर्जा, संघर्ष चेतना और प्रखर विश्वदृष्टि का ज़रूरी हिस्सा कुल्लू की युवा सृजनशीलता पर अपना असर डाल रहा  होगा. आमिन !


Thursday, July 5, 2012


लाहुल-स्पिति में शराब सेवन की परम्‍परा
--(राहुल देव लरजे)

        ऐसा इलाका जहां शराब के बिना सारा कार्यक्रम अधूरा दिखता है। जीं हां,हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहुल-स्पिति में शराब को इतनी ज्‍यादा तरजीह दी जाती है कि पूछिए मत। जैसा कि भारत के कुछ जनजातीय इलाके अपनी विशिष्‍ठ रिवाजों के लिए जाने जाते हैं तो लाहुल-स्पिति में भी सामुहिक समारोहों में शराब का सेवन और रिवाज आम है। शादी-विवाह का समारोह हो या कोई गेदरिंग,खेतों  से थक कर काम से लौटें हो या कोई मेहमाननवाजी, हर खास मौकों पर शराब परोसना यहां का रिवाज है। खाली समय में स्‍थानीय युवा समय व्‍यतीत करने के लिए ‘’गोची’’ यानि गेदरिंग करते हैं तो हल्‍की-फुल्‍की शराब का सेवन कर अपना मनोरंजन करते हैं। शादियों में तो पीने वालों की यहां पौ-बारह होती है। दरअसल परम्‍पराओं के अलावा लाहुल-स्पिति की जलवायू का असर भी यहां के खान-पान पर बहुत ज्‍यादा है। विशेषकर शीत ऋतु में व्‍यापक ठण्‍ड के चलते शराब का सेवन शरीर के तापमान को बनाए रखने के लिए जरूरी हो जाता है।

         शादी-ब्‍याह का समारोह तो लाहुल-स्पिति में बिना शराब के सोची ही नहीं जा सकती क्‍योंकि मेहमानों का स्‍वागत शराब से ही किया जाता है और खान-पान के दौर में शराब का सेवन बहुत ज्‍यादा होता है और बारातियों को छका-छका कर खूब पिलाई जाती है।युवा हों या बुढ़े सभी पी के धमाचोकड़ी मचाते हैं और एक-दूसरे का खूब मनोरंजन भी करते हैं। शराब चढ़ने के बाद नाचने-गाने से बारातीगण शादी में रौनक ले आते हैं और मस्‍ती से सराबोर वे ढोल-बांसुरी पर झूम गा कर सब के नजरों का केन्‍द्र बन जाते हैं। बारातियों को रास्‍तों के पड़ावों में पीने के लिए अलग से शराब ढोई जाती है जिसे ‘’लमछंग’’ कहते हैं। साथ ही मेहमानों और बारातियों के स्‍वागत में घरों के बाहर या कमरों में बैठने पर तुरन्‍त एवं खाने-पीने से पहले शगुन या शागुण भी किया जाता है जिसे मेजबान लोग पवित्र शुर या जूनिफर के पतों से शराब के छींटें बिखरा कर करते हैं। बारात में लड़के वालों की तरफ से शराब की भान्ति एक अन्‍य नशे वाली पेय पदार्थ जिसे लुगड़ी या चाक्‍ती कहते हैं को कुछ लड़कियां जो विशेष परिधान में होती हैं,‍रिवाज अनुसार बारातियों को स्‍वाद चखाती हैं। 
         

       परम्‍पराओं के अनुरूप लाहुल के कई इलाकों में शादी के समारोह में पीने-पीलाने का अपना-अपना विशिष्‍ट तरीका होता है। कुछ घाटियों में शराब पिलाने का जिम्‍मा हर कमरों में दो औरतों के जोड़ों को दिया जाता है जो बेहद आकर्षक पोशाक और शाल ओढ़े हुए होती हैं और वे कई बार बारातियों को शरारत में सुई चुभो कर एवं डरा कर भी पिलाते हैं। मकसद साफ रहता है कि खुशी के माहौल में बारातियों को खूब पिलाई जाए। यानि यह कहें कि साकी का महत्‍व ऐसे खास माहौल में बेहद ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण हो जाता है।


     लाहुल की परम्‍पराओं में शराब का महत्‍व इस कद्र है कि जब किसी के घर पुत्र जन्‍म लेता है तो बधाई स्‍वरूप शराब की बोतल ले जाने की परम्‍परा है जिसे कारछोल कहते हैं।यानि शराब के बिना सभी रस्‍में अधूरी हैं।



     प्रैक्‍टीकली कई बार यह भी देखा गया है कि शादियों में न पीने वालों की बजाए पीने वालों की सेवा खूब होती है। सेवादार या मेजबान लोग शराब पीने वालों को खाने-पीने के लिए मीट,चिकन और सलाद वगैरह पेश करते रहते हैं जबकि न पीने वालों को  महज मीठी चाय और स्‍थानीय नमकीन चाय के साथ सन्‍तुष्‍ठ रहना पड़ता है। शराब के नशे में झुलने पर पीने वाले गाते हैं,नाचते हैं और गप्‍पे  हांक कर एक-दूसरे  का मन बहलाते हैं जबकि न पीने वाले कोने में बैठ कर बोरियत से निहार कर मजबूरी में समय काट रहे होते हैं। 
  
             इस बात में कोई दो राय नहीं कि शराब पीने से आदमी खुल जाता है यानि उस की झिझक मिट जाती है और उसके व्‍यक्तित्‍व की एक दूसरी छवि देखने को मिलती है जो सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन करना और बांटना चाहता है। यहां एक बात साफ कर लें कि शराब की लत लगने पर हमेशा नशे के लिए पीना एक अलग बात है किन्‍तु वहीं  खास मौकों पे मनोरंजन के लिए खूब पीना बिल्‍कुल अलग बात है। जिस भी घर में शादी का आयोजन होना हो वहां पहले शराब के एरेन्‍जमेंन्‍ट की चिन्‍ता घरवालों को सताती है। देसी शराब और लुगड़ी  को तो घर में ही निकाला या बनाया जाता है किन्‍तु अंग्रेजी शराब के लिए स्‍थानीय लोग भागम-दोड़ी भी करते हैं और ठेकों से शराब भी धड़ल्‍ले से बिक जाता है।

      

     पूरे साल के 8-10 महीनों में जब यहां की मेहनतकश जनता खेतों-खलियानों में डटी रहती है तो अपनी थकान और मूड को शादी-ब्‍याह के समारोहों से बहलाती है और किसी के खुशी में शरीक होने पर खूब शराब का सेवन कर के अच्‍छा समय बिताना उन के लिए लाजमी बन जाता है।
    
   जैसे-जैसे लाहुल आर्थिक तरक्‍की की राह पर है वैसे-वैसे शादी-ब्‍याह के समाराहों में अंग्रेजी शराब के ब्रांड के स्‍तर में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। किसी जमाने में डी.एस.पी. और अरिस्‍टोक्रेट परोसे जाते थे किन्‍तु आज प्रिमियम ब्रांड जैसे की रोयल स्‍टैग और रोयल चैलैन्‍ज आम हैं। कुछ घरों में धनसम्‍पदा और दिखावे के चलते अब पीटरस्‍कोट, बलेण्‍डरज प्राईड और टीचर तक के मंहगे और हाई ब्रांड भी परोसे जा रहे हैं यानि के लाखों रूपये अब इन मंहगे शराब की खरीददारी में लगाए जा रहे हैं।
 
         अब अंग्रेजी शराब पर फिजूलखर्ची के चलते लाहुल के अधिकतर इलाकों में ग्राम पंचायतों तथा महिला मण्‍डलों के सामुहिक प्रयासों द्वारा कुछ सख्‍त निर्णय लिए गए हैं जिस में यदि शादी वाले घर में अंग्रेजी शराब और बीयर को परोसते पाया गया तो 25 हजार रूपये तक का जुर्माना ठोकने का प्रावधान किया गया है। इस के लिए गाहर,तोद और चांग्‍सा घाटी के कई पंचायत और महिला मण्‍डल बधाई के पात्र हैं। कई बार कुछ धन सम्‍पन्‍न लोगों ने पारिवारिक प्रतिष्‍ठा के चलते इस तरह के जुर्माने राशी की भरपाई कर नियोजित रूप से अंग्रेजी शराब परोसा और पंचायत के निर्णयों की धज्जियां भी उड़ायीं किन्‍तु अब सख्‍ती होने से व्‍यापक असर देखने को मिल रहा है। इस तरह के निर्णयों से वास्‍तव में जनता का ही फायदा है। इस से फिजूलखर्ची भी कम हो रही है और लोकल शराब के अस्तित्‍व को भी उचित संरक्षण मिल रहा है।  स्‍थानीय शराब की महतता इस लिए भी है कि यह अग्रेंजी शराब की तुलना में ज्‍यादा घातक नहीं होता और बोतलों पे बोतल गट जाने के बाद भी आदमी सुफी हालत में रहता है जबकि उतनी ही मात्रा में इंगलिश शराब पीने वाले लुढ़क जाते हैं। यानि यह कहें कि शराब के नशे की डिग्री की तुलना में लाहुली शराब तुरन्‍त चढ़ती भी और उतर भी जाती है जो कि एक व्‍यस्‍त और जिम्‍मेदार आदमी के लिए अच्‍छा भी है।

       कई बार अंग्रेजी शराब की भान्ति बीयर को भी शादी- ब्‍याह में पानी की तरह परोसा जाता है जो कि बेहद गलत है। विशेषकर टीनऐजर अपनी उम्र का ख्‍याल करते हुए और बड़ों के समुख शिष्‍टता दिखाते हुए बीयर का सेवन करते हैं और उन की बढ़ती मांग को समारोह में पूरी करना मुश्किल हो जाता है। जैसा कि विदित है कि बीयर कीमती भी होता है और इस में नशे की डिग्री कम होने के कारण इस की खपत की सम्‍भावना भी ज्‍यादा रहती है यानि मांग और पूर्ति में सन्‍तुलन रखना बेहद कठिन हो जाता है। बीयर की बजाए लोकल लुगड़ी या छांग वास्‍तव में परोसी जानी चाहिए क्‍योंकि यह एक प्रकार जौ से बनी खुराक से प्रचूर पैय पदार्थ भी होती है और प्‍यास पर भी नियन्‍त्रण रखती है।

      लाहुल-स्पिति में शराब एक संस्कृति  का हिस्‍सा है तो यह कहना कुछ हद तक गलत नहीं होगा। यहां के स्‍थानीय प्रशासन तन्‍त्र को भी इस परम्‍परा के बारे में पूरा ज्ञान है और हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्‍याओं और   प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा पुलिस मेहकमों और एक्‍साईज डिपार्टमैन्‍ट को भी शायद लिखित हिदायत है कि एक्‍साईज ऐक्‍ट के दफाओं के अनुपालन में लाहुल-स्पिति को थोड़ी रियायत दी जाए। इस में यह प्रोविजन है कि लाहुल-स्पिति  की स्थानीय जनजातीय जनता यदि शादी-विवाह के समारोह हेतू घरों में देसी शराब बनाती है तो एक मात्रा तक बनाने और ले जाने की छूट भी दी जानी आवश्‍यक है और इसे गैर कानूनी नहीं माना जाएगा। यानि इस का तात्‍पर्य यह भी लगाया जा सकता है कि इस इलाके में शराब यदि बेचने की बजाए सामुहिक समारोह आदि में सेल्‍फ-कन्‍जमशन के लिए है तो गैर-कानूनी नहीं है।  

       आज पढ़े लिखे लोगों की संख्‍या लाहुल-स्पिति में दिन ब दिन बढ़ रही है और शराब पीने से होने वाली बीमारियों से वह वाकिफ भी हैं। शराब से न सिर्फ सेहत खराब होती है बल्कि घर भी उजड़ जाते हैं। इसकी लत लगने से आदमी का मानसिक और शारीरिक सन्‍तुलन नहीं रहता और धीरे-धीरे वह सब कुछ गंवा सकता है। लाहुल-स्पिति के सन्‍दर्भ में यहां की जलवायू और परम्‍पराओं को देखते हुए शराब महज कभी-कभार मनोरंजन एवं थकान मिटाने के उदेश्‍य से यदि जनता पीती है तो गलत नहीं है किन्‍तु इसे लत बना कर नशे के लिए रोज पीना सरासर गलत है। शराबी ज्‍यादा शराब पीने के चलते समाज में सब की नजरों से गिर जाता है और उस की इज्‍जत भी धीरे-धीरे गर्क में चली जाती है।रोजाना शराब पीने से जो आर्थिक नुकसान होता है उसकी भरपाई करना एक परिवार के लिए बेहद असम्‍भव होता है।

           मैं यहां यह लेख लिख कर शराब और शराबियों की तरफदारी नहीं कर रहा हूं बल्कि लाहुल
-स्पिति की इस विशिष्‍ट शराब पीने की परम्‍परा पर प्रकाश डाल रहा हूं जो कि बाहरी जनता के लिए भी अदभुत है। बस पीने वालों के कदम नहीं बहकने चाहिए,नेतिकता की डोर को लांघना नहीं चाहिए। साफ शब्‍दों में कहूं तो मनोरंजनके लिए कभी-कभार पीना उचित है किन्‍तु नशे के लिए सेवन बेहद घातक है। लाहुल के सन्‍दर्भ में भी शराब वास्‍तव में मनोरंजन के लिए ही है और सदियों से हमारे पूर्वजों ने कष्‍ठ झेल कर जिस तरह जीवन-यापन किया होगा और उन की मेहनत की वजह से आज जिस भूमि पर हम लोग गुजर-बसर कर रहें हैं,तरक्‍की कर रहे हैं वह दुनिया के लिए उदाहरण है किन्‍तु शराब के सेवन पर नियन्‍त्रण रखना हर स्‍थानीय जिम्‍मेवार व्‍यक्ति का कर्तव्‍य है अन्‍यथा अगली पीढ़ी उन्‍हें कोसेगी या उसी का अनुसरण कर गर्क में बढ़ती जाएगी। न पीने वालों के लिए तो बहुत ही अच्‍छा है किन्‍तु पीने वालों को इसकी लिमिट रखना बेहद ही आवश्‍यक है।